मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
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सोमवार, 5 मार्च 2012

इमानदारी या मासूमियत...

चित्र यहाँ से चुराया है मैंने.....

सोंचा था सुबह सबसे पहले ऑफिस पहुँच कर एक पोस्ट डालूँगा अपने ब्लॉग पर फिर काम की शुरुआत होगी... पर जैसा कि आप सब भी जानते है, आज है सोमवार... और आज का दिन तो सोंचने की फुर्सत भी नहीं देता... पर खैर अभी समय निकाल ही लिया मैंने... ऑफिस के लोग अपने पेट भरने में लगे है और मैं अपने मन को भरने में... बात बड़ी छोटी सी है लेकिन मेरे लिए नहीं... एक ऐसी शख्शियत से आज आपका परिचय करवाना चाहता हूँ... ये शख्शियत ऐसी है जिनसे आपकी रोज मुलाक़ात होती होगी पर आपने कभी इन्हें अहमियत न दी होगी... वैसे यही हाल मेरा भी था पर शनिवार के शाम की छोटी सी घटना में उस बच्चे ने मेरे दिल को छू लिया...

हुआ यूँ कि शनिवार को ऑफिस का काम निपटा कर लगभग साढ़े छः बजे ऑफिस से निकला... हम कुल चार लोग एक साथ एक ही कार में सवार थे... एक चौराहे पर लाल-बत्ती पर हमारी गाडी रुकी और रोज की ही तरह एक हाथ हमारे सामने मांगने के लिए प्रकट हो गया... हर बार की तरह हमने हट-हट की आवाज लगायी और मुंह सिकोड़ते हुए उसे जाने का इशारा किया... किसी भी भिखारी को देखते ही अनायास ही मेरे मुंह से कुछ-न-कुछ अभद्र शब्द निकल ही जाते है... वही हुआ... उसकी उम्र बमुश्किल चार-पांच साल की होगी... हम जितना उसे भगाने के लिए हट-हट कर रहे थे उतना ही उसका भी हठ बढ़ता जा रहा था.... लाल-बत्ती भी हरी होने का नाम ले नहीं रही थी... खीझ कर आखिर मैंने जेब में हाथ डाला एक दो रुपये का सिक्का निकाल कर उसके हाथ में थमा दिया और कार का शीशा बंद करने लगा... पर तभी उसने इशारे से रोका और सिक्का लौटाने लगा... मैंने उससे पूछा, "ये क्या है? लौटा क्यों रहे हो?" उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, "साहब! आपने दो रुपये का सिक्का दिया था एक रुपये वापस कर रहा हूँ"...

उसकी ये इमानदारी या फिर मासूमियत सच में मेरे दिल को छू गयी.... पर एक बात और है कि आज तो वो बच्चा है पर जैसे-जैसे वो बड़ा होता जायेगा उसकी ये इमानदारी और मासूमियत खोटी चली जाएगी और वो भी हमसब की तरह "आदमी" हो जायेगा...

इस पोस्ट को लिखते-लिखते अचानक बीच में छोड़ कर भागना पड़ा अपनी सीट को छोड़ कर... दिल्ली में तगड़े भूकंम्प के झटको ने सारी भावनाएं हिला दी... उस वक़्त तो मैंने बस यही सोंचा कि अभी तो भाग लो भैया, बचे रहेंगे तो और न जाने कितने ऐसे पोस्ट लिख डालेंगे और वरना अपनी ख़ामोशी की तरह हम भी खामोश हो जायेंगे फिर लोग यही कहेंगे... एक था जो चिल्ला-चिल्लाकर अपनी ख़ामोशी सुनाता था....

1 कुछ आपकी खामोशी:

रविकर ने कहा…

बाल-बुद्धि लायक प्रभू , दुनिया देव बनाय ।
दुनिया लायक अन्यथा, हिकमत देव सिखाय ।।


दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक

dineshkidillagi.blogspot.com

होली है होलो हुलस, हुल्लड़ हुन हुल्लास।
कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

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