मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
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बुधवार, 7 अप्रैल 2010

खामोश हो गई सांसे


एक हजार नक्सली... पुरानी रणनीति... और 76 जवान बने शिकार। हमले की निंदा हुई... बैठक हुई... बयानबाजी हुई.. बयान आया चूक हो गई। इन सबके बीच सबने कुछ कुछ जरूर कहा... लेकिन बयानों से क्या हमारे वीर वापस लौट आएंगे। केंद्र और राज्य सरकार क्या जबाव देगी उन मांओं को जिनके घर का चिराग बुझ गया... क्या जवाब देगी उन बहनों को जिनकी राखियां कलाइयों को तरसेगी... विधवाओं की सूनी मांग चीख-चीख कर सवाल करेगी... बच्चों की मायूस निगाहें कई खामोश सवालात करेगी?  सवाल सिर्फ सरकार से नहीं उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से भी किया जाएगा जो नक्सलियों के पैरवीकार हैं। महज एक दिन पहले ही देश के गृहमंत्री ने दावा किया था कि 2-3 साल में नक्सलियों का नामोंनिशां तक मिटा देंगे... और बस एक दिन बाद ही ये बयान देना पड़ा कि सॉरी, कहीं कहीं चूक हुई हैचूक किसी की भी हो लेकिन कब तक चलेगा ये सब ? सरकार बैठक, समीक्षा और महज बयानबाजी कर अपनी जिम्मेवारियों से नहीं बच सकती। आखिर क्या वजह है कि नक्सली इतनी बड़ी संख्या में योजनाबद्ध तरिके से चक्रव्यूह रचते हैं और जवान उसमें आसानी से फंस जाते हैं। सरकार की खूफियां एंजेसियों और सुरक्षा व्यवस्था में जुटे लोगों को आईपीएल और सानिया-शोएब की शादी से शायद फुर्सत मिल रही हो, तभी तो एक हजार नक्सली नाक के नीचे देश की सबसे बड़ी वारदात को अंजाम देकर बच जाते हैं और नेताओं को शहीदों के शव पर  सियासत का एक और सुनहरा मौका मिल जाता है। कई दशक बीत गए, नक्सली लगातार वारदात करते रहे और संसद के गलियारों तक पहुंचने वाले लोग अपनी-अपनी रोटियां सेकते रहे। चीन और पाकिस्तान से लोहा लेने का दावा करने वाली सरकार मुट्ठी भर नक्सलियों के आगे घुटने टेक देती है... ऐसे में हम अपनी सुरक्षा को लेकर कितनी उम्मीद रख सकते हैं। तमाम संसाधनों के होते हुए भी नक्सलियों के फन को नहीं कुचलना सरकार की लाचारी को बता रही है... या तो सरकार इस मुद्दे पर संजीदा नहीं है या फिर वो इस मुद्दे को खत्म नहीं होने देना चाहती ताकि इसी बहाने वो सियासत करते रहें। लेकिन सवाल उन जिंदगियों का है जो लाल जंग की भेंट चढ़ गए... सवाल उन परिवारों का है जो शहीदों के भरोसे थे और सवाल आपकी-हमारी हिफाजत का है... कई सुलगते सवाल मन को सुलगा रहे हैं... लेकिन जवाब कुछ नहीं मिल रहा? दिल अब भी ये मानने को तैयार नहीं है कि हमने 76 जवानों को खो दिया है... छत्तीसगढ़ लहूलुहान हो गया है और हमारा मन भी।

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