आज मेरे पास सुनाने को हम दोस्तों का कोई संस्मरण नहीं है. जब दोस्त ही साथ न हो तो उनकी यादों का हम क्या करेंगे? बस यही कुछ हाल मेरा भी है. हम दोस्तों की लिस्ट बहुत लम्बी थी... या यूँ कहें सारे लोग ही हमारे दोस्त थे, चाहे वो चाय-वाला, गोलगप्पे-वाला, सिगरेट वाला, ऑटो-वाला, सब्जी वाला, रिक्शा वाला ही क्यों न हो. इसलिए तो हमें कभी दिक्कत नहीं हुआ करती थी. उन दिनों को इस नए अजनबी शहर में जरूर ढूंढने की कोशिश करती हूँ पर नाकामयाब ही रह जाती हूँ.
हाँ तो हजारों दोस्तों में हम १२ लोग ऐसे थे जो शायद एक-दुसरे के बिना नहीं जी सकते थे. किसी को छींक भी आती तो बाकी दवा खाने दौड़ पड़ते थे. मिनट भर में खबर पूरी दुनिया में फ़ैल जाता, ऐसा लगता जैसे आजतक और स्टार न्यूज़ वाले हमारे ही पीछे पड़े है.
हम १२ दोस्त... मैं (दीपिका कुमारी उर्फ़ दीप), अभिषेक प्रसाद (अवि), राघव सिंह, रश्मि सिन्हा (रैश), अनिकेत वर्मा (अनी), अमित कुमार सिन्हा, सोमा वर्मा, शशांक मल्लिक, अभिषेक अनंत (रिंकू), स्वाति सिन्हा (स्वात), कंचन सिन्हा (कांच) और आशीष कुमार. हम सबके अजीबोगरीब नाम हुआ करते थे, जिनका श्रेय अवि को जाता है. वो मुझे 'डिबिया', रश्मि को 'नानी', कंचन को 'सोना', स्वाति को 'झगडालू', रिंकू को 'चाचा', सोमा को 'सोती माँ', अनिकेत को 'धुंआ' और अमित को 'बोतल' कहा करता था. और हमसब उसे 'बाबूजी' कह कर बुलाते. हम सब के लिए बाबूजी ही था वो, हर बात में रोकना, टोकना... ऐसा मत करो, यहाँ मत जाओ, ये कपडे मत पहनो, देखो इस तरह मत बात करो, लोग क्या कहेंगे... यही उसकी आदत थी. इसलिए हम सबने उसका नाम ही रख दिया था 'बाबूजी'. हम १२ दोस्तों में ही एक हमारा 'पागल गधा' भी है. नाम नहीं बताउंगी क्योंकि उसे अच्छा नहीं लगेगा.
हम सारे दोस्त बहुत मस्ती करते. शायद ही कोई ऐसा दिन होता जब हम न मिलते. हर शाम हमारी एक साथ गुजरती थी. चाहे कितना भी जरूरी काम क्यों न हो हम शाम खुद के लिए खाली रखते. अवि ने नियम बना रखे थे कि "अगर कोई भी किसी दिन नहीं आया तो उसे अगले ३ दिन के लिए महफ़िल में शामिल नहीं किया जायेगा. कोई अगर समय से लेट पहुँचता है तो उसे भी उस दिन शामिल नहीं होने दिया जायेगा परन्तु उसे सारे समय वहीँ पर बिताना है. वो घर भी लौट कर नहीं जा सकता है और अगर किसी ने ऐसा किया तो उसे ३ दिनों के लिए बेदखल कर दिया जायेगा." हम दोस्तों की महफ़िल शाम ४ बजे लगती थी. ४ से ६ बजे तक लड़के अपनी क्रिकेट की प्रक्टिस किया करते था और हम लडकियां बाहर बैठकर उन्हें खेलते देखती. ६ बजे से ८ बजे तक हमारे घुमने का समय होता था. और साढ़े ८ तक हम सब अपने अपने घरों को पहुँच जाते थे. उन दिनों को याद करती हूँ तो इक्षा होती है तुरंत दौड़ कर वापस उसी समय में पहुँच जाऊं. पर जानती हूँ अब न वो समय रहा और न ही वो दोस्ती.
अभिषेक के ही बनाये हुए नियम थे और एक दिन खुद वही नहीं आया. हम १२ दोस्तों में वो हम सबका सबसे चहेता था. उसकी बात को कोई टाल नहीं सकता था. वो हम सबका केंद्र बिंदु था. अगर कहूँ कि सिर्फ उसके कारण हम सब थे तो गलत नहीं होगा. और वही नहीं आया तो हम सब कुछ छुटा-छुटा सा महसूस कर रहे थे. फ़ोन लगाया, पूरा रिंग हुआ पर किसी ने नहीं उठाया. अगले दिन भी वो नहीं आया. अब तो हमें चिंता हो गयी. ऐसा कभी नहीं हुआ बिना बताये वो कहीं नहीं जाता. कम से कम फ़ोन तो जरूर किया होता उसने. कहीं वो पूर्णिया (उसका पैत्रिक घर) तो नहीं चला गया. हमने उसके घर पूर्णिया भी फ़ोन किया पर मालूम हुआ वो पूर्णिया नहीं आया, बल्कि दो दिनों से उसने वहां भी बात नहीं कि है. हद तो तब हो गयी जब वो तीसरे दिन भी नहीं आया. इन तीन दिनों में हमारा तो दिनचर्या ही बिगड़ गया थी. हम दोस्त मिलते तो थे पर वापस अपने-अपने घर को लौट जाते. रिंकू और अमित दो-तीन बार उसके घर भी गए थे पर वो वहां भी नहीं मिला. अगले दिन रविवार था और हम सब दोस्तों की छुट्टियां भी. हम सबने फैसला किया कि अगले दिन हम सुबह-सुबह ही उसके घर जायेंगे.
अगले दिन रविवार को सुबह ९ बजे मैं, रिंकू, अमित, अनिकेत और रश्मि उसके घर पहुँच चुके थे. पर आश्चर्य उसके घर पर ताला लटका हुआ था. हमें और ज्यादा घबराहट हो गयी. हमने उसके मकान में नीचे रहने वाले उसके किरायेदारों से उसके बारे में पूछा तो उन्होंने कहा वो तो सुबह-सुबह ही कहीं निकला है, और पटना में ही है. हाँ रोज रात को थोडा लेट आज-कल घर आ रहा है. अब तो और भी ज्यादा हम आश्चर्यचकित थे कि वो पटना में ही है और हमसे मिला तक नहीं. रोज कहीं सुबह जाता है और लेट रात वापस आता है. आखिर वो कर क्या रहा है? मैंने उसे अपने मोबाइल से उसके मोबाइल पर फिर कॉल किया. २ रिंग के बाद उसने फ़ोन उठाया.
"हेल्लो कहाँ हो तुम?" मैंने सीधे उससे सवाल किया.
"कहीं नहीं घर पर ही हूँ."
"झूट मत बोल. मैं तेरे घर के सामने खड़ी हूँ."
"इतनी सुबह वहां क्या कर रही हो? मैं बस बगल में ही हूँ. आता हूँ. वहीँ रुको." कहकर उसने फ़ोन काट दिया.
ठीक १३ मिनट के बाद अवि वहां पहुंचा. उसके पहुँचते ही हम लोगों के सवालों की बारिश उस पर शुरू हो गयी. और वो सिर्फ मुस्कुराता हुआ अपने घर का ताला खोला और अन्दर चला गया. हम हैरानी से उसे देखते ही रह गए. थोड़ी देर में उसने ही कहा, "तुम लोगों को अन्दर नहीं आना क्या?" हम सब उसके घर में दाखिल हुए. और फिर वही हमारे सवालों की बारिश शुरू. पर अवि कोई जवाब नहीं दे रहा था बल्कि चुप-चाप अपनी बालकोनी में बैठा हाथों में अखबार लिए पन्ने पलट रहा था. उसके इस तरह जवाब न देने से हम और भी ज्यादा गुस्सा हो रहे थे. जब उसने देखा हम कुछ ज्यादा ही शोर कर रहे है तो उसने धीरे से कहा, "रश्मि किचन में दूध रखा है जरा चाय बना दो सबके लिए. और तुम सब थोडा सांस ले लो फिर आगे हल्ला करना"
"ओह हम हल्ला कर रहे है. तुम तीन दिन आखिर थे कहाँ?" ये सवाल कंचन ने पूछ था जो अभी अभी राघव के साथ घर में दाखिल हो रही थी.
"कहीं नहीं बाबा, थोडा काम में व्यस्त था."
"ऐसा क्या काम था?"
"था मेरा कुछ पर्सोनल काम."
"पर्सोनल? हम दोस्तों में पर्सोनल कब से होने लगा" सवाल रश्मि का था.
"क्यों? नहीं हो सकता क्या?"
"नहीं..." हम सबका एक साथ जवाब था. "तुम तीन से गायब हो, तुमने अपने घर पर भी बात नहीं की है. कोई खबर नहीं तुम्हारा. ऐसा क्या काम था कि तुम्हे किसी चीज का होश नहीं?"
"यार तुम लोग तो पुलिस की तरह पीछे पड़ गए हो."
"जब तक नहीं बताओगे ऐसे ही पूछेंगे और ज्यादा नखरे दिखाओगे तो आज से रहो अपने पर्सोनल काम के साथ. हमसे बात करने की भी जरूरत नहीं." कंचन ने कहा और हम सब भी कंचन की बात से सहमत थे.
"बता मेरे भाई कहाँ था तीन दिन?" रिंकू ने सवाल किया.
"यार मैं किसी को ढूंढ़ रहा था."
"किसको....?"
"एक लड़की को"
"लड़की को और तू.... मजाक तो नहीं कर रहा. कौन है वो? मिली या नहीं? कैसी है? क्यों ढूंढ़ रहा है?" सवालों की बारिश दुबारा चालू हो चुकी थी. हम सब आश्चर्यचकित थे जान कर कि अवि किसी लड़की को ढूंढ़ रहा था. क्योंकि हमने कभी भी अवि को और लड़कों की तरह किसी लड़की के पीछे पागल होते नहीं देखा था.
"पता नहीं यार कौन है वो. मैंने तो उसे सिर्फ एक ही बार देखा है."
"कहाँ रहती है?"
"मालूम नहीं..."
"मालूम नहीं तो उसे ढूंढ़ कहाँ रहे थे?"
"वो मैंने उसे तीन दिनों पहले शाम में रोड नंबर ५ में देखा था. पर अचानक वो गायब हो गयी. फिर पता ही नहीं चला."
"तो तुम उसे रोड नंबर ५ में ढूंड रहे हो?"
"हाँ..." अवि ने बहुत धीरे से जवाब दिया. "कभी न कभी तो उस गली में वो दुबारा दिखेगी न?"
"पागल हो गये हो क्या? पुरे दिन उसी गली में बिता देते हो? तीन दिन से उसी गली में हो?" हम दोस्तों को उसका पागलपन समझ नहीं आ रहा था.
"हाँ..."
"और कह रहे हो हाँ.... नाम नहीं पता, घर नहीं पता, एक बार ही देखा है... और उसके लिए तीन दिन से वहीँ इन्तेजार कर रहे हो..."
अचानक अवि ने जोर से कहा, "हे यार मैंने अभी-अभी उसे देखा."
"कहाँ देखा? यहाँ बैठे बैठे तुम्हे वो कहाँ दिख गयी? सपने में हो अभी तक क्या?"
"नहीं दोस्तों सच में मैंने उसे देखा. सामने वाले घर की छत पर."
"क्या बात कर रहे हो? वो तो ............. घर है न?"
"हाँ यार.... धन्यवाद दोस्तों."
"धन्यवाद पर क्यों?"
"तुम लोग आज अगर नहीं आते तो मैं उसे अभी कैसे देखता? मैं तो उसी गली में उसे ढूंढ़ता रह जाता."
"हाँ ये तो है. पर सिर्फ धन्यवाद से काम नहीं चलेगा, पार्टी चाहिए हमें."
"जरूर मिलेगी... आज शाम में होगी..."
अवि को हँसते मुस्कुराते तो कई बार देखा था. पहली बार उस खुश देख रही थी. उसका ये पागलपन याद आता है तो आज भी हंसी छुट पड़ती है. कोई किसी को सिर्फ एक बार देखकर उसके लिए तीन दिनों तक एक ही जगह कैसे उसका इन्तेजार कर सकता है? शायद हम तो नहीं ही कर सकते थे.... सॉरी अवि... माफ़ करना... बुरा लगा हो तो ये पोस्ट डिलीट कर देना, वैसे भी तुम्हारा ही ब्लॉग है.
''माँ '' के जाने के बाद ''
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टूटी साँस ,टूटी गांठ , लड़ी खुलकर बिखर गयी, रिश्तों की ज़ंजीर की ,कड़ी
खुलकर बिखर गयी। वो क्या गयी !आसमां के भी रूप- रंग बदल गए , आँगन
की चिड़ियों के ,खुद...
2 घंटे पहले














