मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
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मंगलवार, 1 दिसम्बर 2009

तीन दिनों की खोज...


आज मेरे पास सुनाने को हम दोस्तों का कोई संस्मरण नहीं है. जब दोस्त ही साथ न हो तो उनकी यादों का हम क्या करेंगे? बस यही कुछ हाल मेरा भी है. हम दोस्तों की लिस्ट बहुत लम्बी थी... या यूँ कहें सारे लोग ही हमारे दोस्त थे, चाहे वो चाय-वाला, गोलगप्पे-वाला, सिगरेट वाला, ऑटो-वाला, सब्जी वाला, रिक्शा वाला ही क्यों न हो. इसलिए तो हमें कभी दिक्कत नहीं हुआ करती थी. उन दिनों को इस नए अजनबी शहर में जरूर ढूंढने की कोशिश करती हूँ पर नाकामयाब ही रह जाती हूँ.

हाँ तो हजारों दोस्तों में हम १२ लोग ऐसे थे जो शायद एक-दुसरे के बिना नहीं जी सकते थे. किसी को छींक भी आती तो बाकी दवा खाने दौड़ पड़ते थे. मिनट भर में खबर पूरी दुनिया में फ़ैल जाता, ऐसा लगता जैसे आजतक और स्टार न्यूज़ वाले हमारे ही पीछे पड़े है.

हम १२ दोस्त... मैं (दीपिका कुमारी उर्फ़ दीप), अभिषेक प्रसाद (अवि), राघव सिंह, रश्मि सिन्हा (रैश), अनिकेत वर्मा (अनी), अमित कुमार सिन्हा, सोमा वर्मा, शशांक मल्लिक, अभिषेक अनंत (रिंकू), स्वाति सिन्हा (स्वात), कंचन सिन्हा (कांच) और आशीष कुमार. हम सबके अजीबोगरीब नाम हुआ करते थे, जिनका श्रेय अवि को जाता है. वो मुझे 'डिबिया', रश्मि को 'नानी', कंचन को 'सोना', स्वाति को 'झगडालू', रिंकू को 'चाचा', सोमा को 'सोती माँ', अनिकेत को 'धुंआ' और अमित को 'बोतल' कहा करता था. और हमसब उसे 'बाबूजी' कह कर बुलाते. हम सब के लिए बाबूजी ही था वो, हर बात में रोकना, टोकना... ऐसा मत करो, यहाँ मत जाओ, ये कपडे मत पहनो, देखो इस तरह मत बात करो, लोग क्या कहेंगे... यही उसकी आदत थी. इसलिए हम सबने उसका नाम ही रख दिया था 'बाबूजी'. हम १२ दोस्तों में ही एक हमारा 'पागल गधा' भी है. नाम नहीं बताउंगी क्योंकि  उसे अच्छा नहीं लगेगा.

हम सारे दोस्त बहुत मस्ती करते. शायद ही कोई ऐसा दिन होता जब हम न मिलते. हर शाम हमारी एक साथ गुजरती थी. चाहे कितना भी जरूरी काम क्यों न हो हम शाम खुद के लिए खाली रखते. अवि ने नियम बना रखे थे कि "अगर कोई भी किसी दिन नहीं आया तो उसे अगले ३ दिन के लिए महफ़िल में शामिल नहीं किया जायेगा. कोई अगर समय से लेट पहुँचता है तो उसे भी उस दिन शामिल नहीं होने दिया जायेगा परन्तु उसे सारे समय वहीँ पर बिताना है. वो घर भी लौट कर नहीं जा सकता है और अगर किसी ने ऐसा किया तो उसे ३ दिनों के लिए बेदखल कर दिया जायेगा." हम दोस्तों की महफ़िल शाम ४ बजे लगती थी. ४ से ६ बजे तक लड़के अपनी क्रिकेट की प्रक्टिस किया करते था और हम लडकियां बाहर बैठकर उन्हें खेलते देखती. ६ बजे से ८ बजे तक हमारे घुमने का समय होता था. और साढ़े ८ तक हम सब अपने अपने घरों को पहुँच जाते थे. उन दिनों को याद करती हूँ तो इक्षा होती है तुरंत दौड़ कर वापस उसी समय में पहुँच जाऊं. पर जानती हूँ अब न वो समय रहा और न ही वो दोस्ती.

अभिषेक के ही बनाये हुए नियम थे और एक दिन खुद वही नहीं आया. हम १२ दोस्तों में वो हम सबका सबसे चहेता था. उसकी बात को कोई टाल नहीं सकता था. वो हम सबका केंद्र बिंदु था. अगर कहूँ कि सिर्फ उसके कारण हम सब थे तो गलत नहीं होगा. और वही नहीं आया तो हम सब कुछ छुटा-छुटा सा महसूस कर रहे थे. फ़ोन लगाया, पूरा रिंग हुआ पर किसी ने नहीं उठाया. अगले दिन भी वो नहीं आया. अब तो हमें चिंता हो गयी. ऐसा कभी नहीं हुआ बिना बताये वो कहीं नहीं जाता. कम से कम फ़ोन तो जरूर किया होता उसने. कहीं वो पूर्णिया (उसका पैत्रिक घर) तो नहीं चला गया. हमने उसके घर पूर्णिया भी फ़ोन किया पर मालूम हुआ वो पूर्णिया नहीं आया, बल्कि दो दिनों से उसने वहां भी बात नहीं कि है. हद तो तब हो गयी जब वो तीसरे दिन भी नहीं आया. इन तीन दिनों में हमारा तो दिनचर्या ही बिगड़ गया थी. हम दोस्त मिलते तो थे पर वापस अपने-अपने घर को लौट जाते. रिंकू और अमित दो-तीन बार उसके घर भी गए थे पर वो वहां भी नहीं मिला. अगले दिन रविवार था और हम सब दोस्तों की छुट्टियां भी. हम सबने फैसला किया कि अगले दिन हम सुबह-सुबह ही उसके घर जायेंगे.


अगले दिन रविवार को सुबह ९ बजे मैं, रिंकू, अमित, अनिकेत और रश्मि उसके घर पहुँच चुके थे. पर आश्चर्य उसके घर पर ताला लटका हुआ था. हमें और ज्यादा घबराहट हो गयी. हमने उसके मकान में नीचे रहने वाले उसके किरायेदारों से उसके बारे में पूछा तो उन्होंने कहा वो तो सुबह-सुबह ही कहीं निकला है, और पटना में ही है. हाँ रोज रात को थोडा लेट आज-कल घर आ रहा है. अब तो और भी ज्यादा हम आश्चर्यचकित थे कि वो पटना में ही है और हमसे मिला तक नहीं. रोज कहीं सुबह जाता है और लेट रात वापस आता है. आखिर वो कर क्या रहा है? मैंने उसे अपने मोबाइल से उसके मोबाइल पर फिर कॉल किया. २ रिंग के बाद उसने फ़ोन उठाया.
"हेल्लो कहाँ हो तुम?" मैंने सीधे उससे सवाल किया.
"कहीं नहीं घर पर ही हूँ."
"झूट मत बोल. मैं तेरे घर के सामने खड़ी हूँ."
"इतनी सुबह वहां क्या कर रही हो? मैं बस बगल में ही हूँ. आता हूँ. वहीँ रुको." कहकर उसने फ़ोन काट दिया.

ठीक १३ मिनट के बाद अवि वहां पहुंचा. उसके पहुँचते ही हम लोगों के सवालों की बारिश उस पर शुरू हो गयी. और वो सिर्फ मुस्कुराता हुआ अपने घर का ताला खोला और अन्दर चला गया. हम हैरानी से उसे देखते ही रह गए. थोड़ी देर में उसने ही कहा, "तुम लोगों को अन्दर नहीं आना क्या?" हम सब उसके घर में दाखिल हुए. और फिर वही हमारे सवालों की बारिश शुरू. पर अवि कोई जवाब नहीं दे रहा था बल्कि चुप-चाप अपनी बालकोनी में बैठा हाथों में अखबार लिए पन्ने पलट रहा था. उसके इस तरह जवाब न देने से हम और भी ज्यादा गुस्सा हो रहे थे. जब उसने देखा हम कुछ ज्यादा ही शोर कर रहे है तो उसने धीरे से कहा, "रश्मि किचन में दूध रखा है जरा चाय बना दो सबके लिए. और तुम सब थोडा सांस ले लो फिर आगे हल्ला करना"
"ओह हम हल्ला कर रहे है. तुम तीन दिन आखिर थे कहाँ?" ये सवाल कंचन ने पूछ था जो अभी अभी राघव के साथ घर में दाखिल हो रही थी.
"कहीं नहीं बाबा, थोडा काम में व्यस्त था."
"ऐसा क्या काम था?"
"था मेरा कुछ पर्सोनल काम."
"पर्सोनल? हम दोस्तों में पर्सोनल कब से होने लगा" सवाल रश्मि का था.
"क्यों? नहीं हो सकता क्या?"
"नहीं..." हम सबका एक साथ जवाब था. "तुम तीन से गायब हो, तुमने अपने घर पर भी बात नहीं की है. कोई खबर नहीं तुम्हारा. ऐसा क्या काम था कि तुम्हे किसी चीज का होश नहीं?"
"यार तुम लोग तो पुलिस की तरह पीछे पड़ गए हो."
"जब तक नहीं बताओगे ऐसे ही पूछेंगे और ज्यादा नखरे दिखाओगे तो आज से रहो अपने पर्सोनल काम के साथ. हमसे बात करने की भी जरूरत नहीं." कंचन ने कहा और हम सब भी कंचन की बात से सहमत थे.
"बता मेरे भाई कहाँ था तीन दिन?" रिंकू ने सवाल किया.
"यार मैं किसी को ढूंढ़ रहा था."
"किसको....?"
"एक लड़की को"
"लड़की को और तू.... मजाक तो नहीं कर रहा. कौन है वो? मिली या नहीं? कैसी है? क्यों ढूंढ़ रहा है?" सवालों की बारिश दुबारा चालू हो चुकी थी. हम सब आश्चर्यचकित थे जान कर कि अवि किसी लड़की को ढूंढ़ रहा था. क्योंकि हमने कभी भी अवि को और लड़कों की तरह किसी लड़की के पीछे पागल होते नहीं देखा था.
"पता नहीं यार कौन है वो. मैंने तो उसे सिर्फ एक ही बार देखा है."
"कहाँ रहती है?"
"मालूम नहीं..."
"मालूम नहीं तो उसे ढूंढ़ कहाँ रहे थे?"
"वो मैंने उसे तीन दिनों पहले शाम में रोड नंबर ५ में देखा था. पर अचानक वो गायब हो गयी. फिर पता ही नहीं चला."
"तो तुम उसे रोड नंबर ५ में ढूंड रहे हो?"
"हाँ..." अवि ने बहुत धीरे से जवाब दिया. "कभी न कभी तो उस गली में वो दुबारा दिखेगी न?"
"पागल हो गये हो क्या? पुरे दिन उसी गली में बिता देते हो? तीन दिन से उसी गली में हो?" हम दोस्तों को उसका पागलपन समझ नहीं आ रहा था.
"हाँ..."
"और कह रहे हो हाँ.... नाम नहीं पता, घर नहीं पता, एक बार ही देखा है... और उसके लिए तीन दिन से वहीँ इन्तेजार कर रहे हो..."
अचानक अवि ने जोर से कहा, "हे यार मैंने अभी-अभी उसे देखा."
"कहाँ देखा? यहाँ बैठे बैठे तुम्हे वो कहाँ दिख गयी? सपने में हो अभी तक क्या?"
"नहीं दोस्तों सच में मैंने उसे देखा. सामने वाले घर की छत पर."
"क्या बात कर रहे हो? वो तो ............. घर है न?"
"हाँ यार.... धन्यवाद दोस्तों."
"धन्यवाद पर क्यों?"
"तुम लोग आज अगर नहीं आते तो मैं उसे अभी कैसे देखता? मैं तो उसी गली में उसे ढूंढ़ता रह जाता."
"हाँ ये तो है. पर सिर्फ धन्यवाद से काम नहीं चलेगा, पार्टी चाहिए हमें."
"जरूर मिलेगी... आज शाम में होगी..."

अवि को हँसते मुस्कुराते तो कई बार देखा था. पहली बार उस खुश देख रही थी. उसका ये पागलपन याद आता है तो आज भी हंसी छुट पड़ती है. कोई किसी को सिर्फ एक बार देखकर उसके लिए तीन दिनों तक एक ही जगह कैसे उसका इन्तेजार कर सकता है? शायद हम तो नहीं ही कर सकते थे.... सॉरी अवि... माफ़ करना... बुरा लगा हो तो ये पोस्ट डिलीट कर देना, वैसे भी तुम्हारा ही ब्लॉग है.

शनिवार, 28 नवम्बर 2009

वापस लौट आओ...


अपने पिछले पोस्ट में आप लोगों को मैंने अपने एक "पागल" दोस्त के बारे में बताया था. आज मैं आपको मेरी सबसे अच्छी दोस्त रश्मि के कुछ विचारों से अवगत कराउंगी. रश्मि हमें पटना में मिली थी. अकेली, उदास पर उन सबसे बढ़कर बहुत खुबसूरत. लेकिन उसकी खूबसूरती हमेशा उसकी उदासी के पीछे छिप जाती. बस इसी उदासी ने हमें उसकी ओर खिंच लिया.



कहते है न कुछ लोगों में समझदारी कुछ ज्यादा ही होती है बस ऐसा ही कुछ उसके साथ भी था. कभी-कभी तो उसकी बातों से मुझे गुस्सा आ जाता पर बाकी लोग उसकी तरफदारी कर देते, जिसके कारण मैं उसे कुछ कह नहीं पाती थी. रश्मि हमेशा से कुछ अलग करने के चक्कर में रहती. कभी किसी को तकलीफ में देखा नहीं कि बस लग गयी उसकी मदद करने. किसी गरीब को देखते ही उसमें दया का सागर उमड़ने लगता. उसके विचार हमेशा मुझमें एक खीझ पैदा करते. मैं हमेशा कहती कि इस दुनिया में ऐसा नहीं होता है. पर वो सिर्फ मुस्कुरा कर यही कहती "इसी दुनिया में वो ऐसा करके दिखाएगी." रश्मि हमेशा कहती कि एक दिन वो एक बच्चे को गोद लेगी और उसका पूरा पालन-पोषण करेगी. मैं उसे कहती कि ये सब सिर्फ फिल्मों में होता है. दुसरे के बच्चे को अपना कहना बहुत कठिन होता है.


"किसी नए को जन्म देने से तो बढ़िया है हम किसी मरते हुए को जिंदगी दे." रश्मि हमेशा कहती.


उसके विचार मुझे ही नहीं हम सब दोस्तों को हमेशा बचकाने लगते. पर हमें से एक ऐसा भी था जो उसके विचारों का पूरा समर्थक था. जो हमसे लड़ पड़ता था उसके विचारों को मनवाने के लिए. और वो था हमारा वही "पागल गधा". हम सारे दोस्त उन दोनों का बहुत मजाक उड़ाते, दोनों को हम लोग शायद पागल से ज्यादा नहीं समझते थे. हम सोंचते थे कि बचकाने विचार समय के साथ खुद ख़त्म हो जायेंगे. बस दिन इसी तरह गुजरते गए. एक वक़्त ऐसा आया जब हम सबको पटना छोड़ना था. हमें अपनी आगे की मंजिल तय करनी थी. रश्मि लन्दन चली गयी, कुछ दोस्त बंगलुरु, कुछ चेन्नई, कुछ पुणे शिफ्ट हो गए. मैं, राघव, कंचन और हमारा "पागल गधा" दिल्ली चले आये. लगभग ६ महीनो के बाद रश्मि वापस भारत आ गयी और चेन्नई में शिफ्ट हो गयी. पर शायद चेन्नई उसे रास नहीं आया. कुछ ही महीनो के बाद ३० दिसम्बर २००७ रश्मि एक एक्सिडेंट में हम सबको को हमेशा के लिए छोड़ गयी.


कुछ राज उसके मौत के बाद हमारे सामने आये. जैसे वो हमारे पागल दोस्त को चाहती थी, पर उसने इसलिए कभी नहीं बताया क्योंकि वो गधा तो किसी और को चाहता था. रश्मि ने एक २ साल की बच्ची को गोद ले रखा था. ये खबर हम सब के लिए बिलकुल ३३००० वोल्ट के झटके के बराबर था. क्योंकि उसने कभी भी किसी को इस बारे में नहीं बताया. हम तो सोंचा करते थे ये सब बस रश्मि के दिमाग का फितूर है, पर उस दिन हमने जाना था वो हम सबसे कहीं ज्यादा सम्जह्दार, जिम्मेदार, और ऊँची है. पर तकलीफ की शुरआत तब हुई जब रश्मि के घरवालों ने रश्मि की मौत के बाद उस बच्ची "नैना" को स्वीकारने से मना कर दिया. हम सबने मिलकर फैसला किया कि हम नैना को किसी अच्छे अनाथालय में दाल देंगे तथा सब मिलकर उसकी खर्च की जिम्मेदारी उठाएंगे. पर उसी समय हमारे पागल दोस्त ने हम सबको चौंका दिया ये कहकर कि वो नैना को किसी अनाथालय नहीं भेजेगा, बल्कि वो उसकी परवरिश करेगा. हमने उसे समझाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं माना.


आज २ सालों से हमारा पागल दोस्त नैना को अकेले पाल रहा है. दोनों दिल्ली में रहते थे. नैना अब ४ साल की हो चुकी है और उसे डैडी कहती है. स्कूल भी जाती है. दोनों बहुत खुश है. हाँ मैंने उसे तब चिंतित देखा है जब नैना उससे अपनी माँ के बारे में पूछती है. एक चुप्पी और कुछ झूठ के अलावा उसके पास और कुछ है भी तो नहीं.


हमारे पागल दोस्त ने हमें गलत साबित कर दिया. उसने प्रमाणित कर दिया कि गधा वो नहीं हम है. उसने हम सबको दिखा दिया कि वो हम सबसे कहीं ज्यादा जिम्मेदार और समझदार है. पर किसी भी अच्छे काम में सबसे बड़ा रोड़ा समाज होता है. हमारे दोस्त को भी इसका सामना करना पड़ा. हर तरफ से उससे सवालों की बारिश होती. हर लोग उसे उसकी बेटी से अलग करने की कोशिश करते रहे. २ सालों तक उसने नैना को अपने घर से भी छिपा कर रखा पर आखिरकार २ महीनों पहले उसके घर पर सब मालूम पड़ गया. उसे उसकी बेटी को छोड़ने का दवाब बनने लगा. पर उस गधे ने फिर पागलों जैसा काम कर दिया. उसने अपनी नौकरी छोड़ दी, दिल्ली में उसका जो भी सामान था बेच दिया, अपने परिवार-दोस्तों को छोड़ दिया और किसी को बिना बताये अपनी बेटी के साथ कहीं चला गया.


"गधे तू इतना कमजोर कबसे हो गया रे. हम पर नहीं खुद पर तो तुझे विश्वास था. घर छोड़ना समझदारी की निशानी नहीं है. एक बार तो अपने परिवार के बारे में सोंचो कि वो कितना परेशान है. हम है तुम्हारे साथ... कोई तकलीफ थी तो हमसे बात कि होती. अच्छे काम में तो लाख रुकावटें आएँगी इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम उसे छोड़ कर ही भाग जाओगे. प्लीज वापस चले आओ. हम सब मिलकर तुम्हारे घर पर बात करेंगे. हम सब दोस्त तुम्हारे साथ है, हम तुमसे तुम्हारी बेटी को अलग नहीं होने देंगे. लेकिन तुम लौट आओ. अपने लिए नहीं हमारे लिए लौट आओ."

बुधवार, 25 नवम्बर 2009

नंगे पाँव धुप में ४ किलोमीटर

पिछले पोस्ट में मैंने हम ४ दोस्तों के बारे में बताया था. वैसे हम दोस्तों की संख्या बहुत ज्यादा है. रश्मि कहती थी "आप जब जन्म लेते है तो सारे रिश्ते आपको बने-बनाए मिलते है. सिर्फ दोती एक ऐसा रिश्ता है जिसे हम खुद बनाते है." बस इस लिए हमने कभी दोस्त बनाने में कंजूसी नहीं की. हम सब दोस्तों की अपनी अलग-अलग क्वालिटी और हरकतें थी. कोई बहुत मजाकिया था तो किसी को मजाक समझ ही नहीं आता था. इस लिए हम सब दोस्तों ने एक-दुसरे के नामकरण भी कर रखे थे. हम अपने एक दोस्त को "पागल गधा" भी कहते थे. मैं उस दोस्त का नाम नहीं लुंगी, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि उसे बुरा लगे. पागल हम उसे इसलिए कहते कि कोई सा भी समय हो हमने उसे कभी सिरियस नहीं देखा था. हमेशा मजाक, मस्ती और फन. वो खुद कहता था कि वो मुर्दे को भी हंसा सकता है. और हम जानते थे वो ऐसा कर सकता था. हम उसे गधा कहते क्योंकि उसकी आदत ही बेवकूफों जैसी थी. उसके लिए उसके परिवार और दोस्त सब कुछ थे. जिन्हें वो अपना एक बार मान लेता उसके लिए कुछ भी कर-गुजरता कभी ये नहीं सोंचता कि किसी काम का क्या अंजाम होगा. उसकी एक प्यार भी थी जिसे वो पागलों की तरह चाहता था. जिसके लिए वो कुछ भी कर सकता था. इस लिए तो हम उसे कहते थे पागल गधा.


अभी कुछ महीनों पहले की ही बात है. मई २००८ की... हमने एक छोटी सी पार्टी राखी थी. रविवार की दोपहर थी. लगभग २ बज रहे होंगे. हम सारे दोस्त पहुँच चुके थे सिर्फ उसे छोड़ कर. कुछ देर बाद हमने उसे आते हुए देखा. हम सबने उसे डांटना शुरू कर दिया. "कहाँ थे इतनी देर? पता है हम आधे घंटे से तुम्हारा इन्तेजार कर रहे है?"

और वो चुप-चाप हमारी डांट सुन रहा था. उसकी आँखों से दो बूंद आंसू ढुलक पड़े. हमें लगा हमने कुछ ज्यादा ही उसे डांट दिया. हम उसे सॉरी कह रहे थे पर उसने कहा..."Don't be sorry. मैं तुम लोगों की डांट के कारण नहीं रो रहा बल्कि दर्द और जलन से आँखों में आंसू है."
"दर्द और जलन? कहाँ?" हमने एक साथ सवाल किया. तभी मेरी नजर उसके पैरों पर पड़ी. वो नंगे पाँव था. उसके पैरों से खून रिस रहा था. तुरंत मैंने उसे बगल राखी बेंच पर बैठने को कहा और उसके पैरों को साफ़ करने लगी. मैंने उससे पूछा.."ये कैसे हुआ? तुम्हारे जूते, चप्पल कहाँ गए? नंगे पाँव क्यों हो?"
"जूते-चप्पल तो घर पर है." उसने मासूमियत से जवाब दिया. उसकी मासूमियत देख कोई भी उस समय उस पर फ़िदा हो सकता था.
"जूते घर पर है? और तुम खाली पैर हो? पागल हो गए हो क्या?" अमित ने उससे पूछा.
""वो मैं देखना चाहता था कि खाली पैर इस गर्मी में चलने पर कितना दर्द होता है..."
"पर क्यों? तुम्हे क्या experiment करने की सूझी?" मैंने तुरंत उससे सवाल किया. इतनी देर में राज दवाइयां और पट्टियां ले आया था.
"कल कोलेज से आते वक़्त उसे (जिसे वो चाहता है) नंगे पैर आना पड़ा था. वो कोलेज से लौट रही थी तो उसकी सैंडल टूट गयी थी. इस गर्मी में वो नंगे पाँव घर चल कर गयी थी कल. रात जब उससे मेरी फ़ोन पर बात हुई थी तो उसने मुझे बताया कि उसके पैरों में बहुत दर्द है और छाले हो गए है." बहुत ही धीरे से उसने हमें उसके नंगे पाँव चलने का कारण बताया.
"और सिर्फ इसलिए तुम भी नंगे पाँव चले आये?" राज ने कहा.
"हाँ, घर से पैदल ही आया हूँ."
"घर से!!!! तुम्हारा घर यहाँ से ४ किलोमीटर दूर है... वहां से तुम पैदल नंगे पाँव?" मैं आश्चर्य से चीख पड़ी.
"सिर्फ चार किलोमीटर. मैं तो और भी चल सकता हूँ अभी."
"अपने पैरों की हालत देखी है तुमने. अगले १० दिन तो अब तुम्हे नंगे पाँव रहने ही होंगे क्योंकि अब तुम जूते तो नहीं ही पहन सकते." मैंने कहा.
"एक बात पूछूं?" अमित ने उससे कहा.
"हाँ-हाँ. दो पूछो."
"तुम उससे इतना प्यार क्यों करते हो?"
"अबे ये क्या पूछ दिया. इसका जवाब तो मेरे पास भी नहीं. पर कोई बात नहीं जिस दिन जवाब मिलेगा सबसे पहले तुझे बताऊंगा. पक्का वादा..."

उसके पैरों में बड़े बड़े छाले हो चुके थे. जगह जगह से खून रिस रहा था उसके बावजूद वो "पागल गधा" सिर्फ मुस्कुरा रहा था. उसे छोड़ कर हम सबके आँखों में आंसू थे.

रविवार, 22 नवम्बर 2009

जीवन के कुछ यादगार पल...

दोस्त शिकायत करते है की मैं ब्लॉग पर कुछ लिखती क्यों नहीं. क्या करूँ एक तो समय नहीं मिलता और दूसरा कोई अच्छी रचना भी इधर बन नहीं पा रही. अपने लास्ट पोस्ट में भी मैंने अभिषेक जी की कविता लिख दी थी, अपनी लिखी कोइ अच्छी कविता मिली ही नहीं थी. आज मैं कोई कविता नहीं लिखूंगी, बल्कि अपने जीवन के अच्छे पलों को याद करुँगी.

हम चार दोस्त थे, मैं, अभिषेक, राघव और रश्मि. हम रोज शाम को एक-दुसरे से मिलते. जैसे शाम को मिलना हमारी जिंदगी का सबसे जरूरी दिनचर्या हो. हम चारो के घर पास पास ही थे. सबसे पहले अभिषेक मेरे घर आता, फिर हम वहां से राघव के घर जाते और तब हम सबसे अंत में रश्मि   को उसके घर से लेते. हम चारो एक साथ फिर टहलने को निकलते. हमारे घर के पास ही एक बाज़ार है, पर हम अपने मोहल्ले की गलियों में ही घुमा करते. मेरी इक्षा होती थी की हम घूमते-घूमते बाज़ार की तरफ भी जाये पर बाकी के तीनो सर्व-सम्मति से उसे ठुकरा दिया करते.

शाम के टहलने के क्रम में ही मुझे याद है कितने ही नए लोगों से हमारी मुलाकातें हुई. कोई किसी का घर ढूंढ़ रहा होता था, किसी को कोई और मदद चाहिए होती थी. मैं इन सबसे परेशान हो जाया करती थी. सोंचती थी लोग कितना तंग करते है. पर बाकी के तीनो ने तो जैसे पूरी दुनिया की मदद करने का ठेका उठा रखा था. हाँ एक चीज और थी, हमें मोहल्ले के सारे लोग पहचानने लगे थे, नाम से तो नहीं पर चेहरे से. हम चारो में हम २ लडकियां थीं और २ लड़के जिसके कारण कोई हमें अच्छी नजर से तो नहीं ही देखता था. ज्यादातर या यूँ कहूँ की लगभग सभी हमें २ प्रेमी जोड़े समझा करते थे. कई लोगों ने तो हमें टोक तक दिया था की ये सब मोहल्ले में नहीं चलेगा. चुकि हम पटना में अकेले रहते थे इसलिए खुल कर मैं उन लोगों का विरोध नहीं कर पाती थी. हाँ उन्हें समझाने की कोशिश जरूर करती थी की हम सिर्फ अच्छे दोस्त है. पर एक बात तो जान गयी थी की उन्हें समझा पाना मुश्किल नहीं असंभव था.

पर हमने कभी भी अपनी दिनचर्या किसी के कहने से नहीं बदली. कभी कभी डर लगता था पर अभिषेक कहता कि डरने की जरूरत नहीं. किसी कहने से कुछ नहीं होता. लोगों को जो सोंचना है उन्हें सोंचने दो. हम जानते है कि हम सही है फिर डर किस बात का. किसी के बाप का न रोड है और न मोहल्ला.

हमारे मोहल्ले के बहार ही एक पानी-पूरी (गोलगप्पे) वाला अपनी दूकान लगाया करता था. रोज टहलने के बाद हम वहां पानी-पूरी खाने जरूर जाते. पानी-पूरी वाले को भी पता था कोई आये या न आये हम जरूर आयेंगे. उसे ये भी याद हो गया था कि मुझे तीखा, अभिषेक को खट्टा, राघव को सुखा और रश्मि को बिना मसाले वाले पानी-पूरी अच्छे लगते है. पानी-पूरी खाने के बाद अभिषेक और राघव का गंतव्य होता बगल का पान-दूकान, क्योंकि उनके अनुसार, अगर घुमने के बाद उन्होंने सिगरेट नहीं पी तो मतलब घूमना व्यर्थ हो गया. अभिषेक और राघव दोनों के अपने अपने फिक्स सिगरेट ब्रांड थे, जो मुझे लगता है कि पटना के आधे से ज्यादा पान-दूकान वालों को याद होगा. क्योंकि मैंने आज तक अभिषेक या राघव को कभी भी दूकान पर जा कर मागते हुए नहीं देखा. वो दूकान पर जाते और दूकान वाला खुद उन दोनों को उनके ब्रांड निकाल कर दे देता.

जब तक दोनों के सिगरेट ख़त्म नहीं हो जाते थे हम थोड़ी देर और टहलते, फिर दोनों मुझे और रश्मि को हमारे घर छोड़ देते और बाज़ार की तरफ निकल जाते एक-एक और सिगरेट पीने के लिए...

मोमेंट्स और भी है... अगली बार...

सोमवार, 10 अगस्त 2009

जैसे मेरा दिल...

छत से लटका पंखा
धीरे-धीरे घूम रहा है
एक अजीब सी आवाज के साथ
बिलकुल वैसे ही
जैसे तुम्हारा प्यार मेरे दिल में
दूर कहीं कोई मजदूर
किसी ईंट पर अपनी छेनी की चोट दे रहा है
बिलकुल वैसे ही
जैसे तुम्हारी याद मेरे मन में
मेरे कानो में इस कमरे की खामोशी यूँ गूंज रही है
जैसे तुम्हारी हँसी
किसी बच्चे के रोने की आवाज
मेरे मस्तिस्क पर पड़ रही है
मानो मैं ही रो रही हूँ
कुछ चीखने चिल्लाने की भी आवाजें है
जैसे मेरी आत्मा चीख रही हो
अभी-अभी कहीं एक कांच टुटा है
बिलकुल वैसे ही
जैसे मेरा दिल...

सुखा पत्ता

घने पेड़ की
एक डाल
पर
सुखा एक
नन्हा पत्ता
हवा का
एक
हल्का झोंका
टूटकर
धरती पे
गिरा
जड़े की
उस सुबह
तुझे देखा पहली बार
और
मैं
सुखा पत्ता
हो गयी...

रविवार, 5 जुलाई 2009

तन्हा तन्हा जिंदगी

सबसे पहले अभिषेक को धन्यवाद देना चाहूंगी की उसने मुझे उसके ब्लॉग पर लिखने का मौका दिया। कविताओं का शौक कभी रहा नहीं हाँ कहानियाँ जरूर पढ़ा करती थी पर सिर्फ नंदन और चम्पक के। पटना में रहते हुए अभिषेक से मिलने का मौका मिला और फिर दोस्ती हो गयी। हम दोस्तों की जब भी महफ़िल जमती अभिषेक अपनी कोई न कोई नयी कविता सुनाया करता. उसकी कवितायेँ अच्छी लगती. धीरे धीरे कविताओं में मन लगने लगा. एक दिन यूँ ही बैठे बैठे कुछ पंक्तियाँ मैंने अपनी कॉपी में लिख डाली. अभिषेक की नजर उसपर पड़ी और उसने उसे खूब सराहा. उसकी सराहना सुनकर विश्वास हुआ की मैं भी थोडा बहुत लिख सकती हूँ. बस कभी कभी बैठ जाती हूँ कुछ अपने मन के भावो को कागज़ पर उतारने. आज मेरे दोस्त मुझे भी कवियों-लेखको के श्रेणियों में रखते है तो मैं इसका पूरा श्रेय सिर्फ अभिषेक को देना चाहूंगी. सच कहती हूँ अभिषेक अगर तुम्हारी हौसला-आफजाई न होती तो मैं शायद उस दिन के बाद कभी नहीं लिखती.

अभिषेक का ब्लॉग हमेशा पढ़ती हूँ. कल यूँ ही मैंने बातों बातों में उससे कह दिया की काश मैं भी अपनी कवितायिएँ ब्लॉग पर पब्लिश करती. बस अभिषेक ने कहा कर सकती हो और दे दिया मौका अपने ब्लॉग पर लिखने का. अभिषेक एक बार फिर बहुत बहुत धन्यवाद. कोशिश करती हूँ तुम जैसा लिख सकने की प जानती हूँ तुम जैसा नहीं हो सकती. अगर पसंद आये तो तुम्हारी सराहना का इन्तेजार रहेगा और अगर पसंद न आये तो भी तुम्हारी राय का इन्तेजार रहेगा.

जिन्दगी तन्हा तन्हा सी गुजर रही थी
अकेली थी, अकेली जी रही थी
कोई गम नहीं, कोई ख़ुशी नहीं
बस जी रही थी सिर्फ जी रही थी
एक शाम तुम्हारा आना मेरी जिंदगी में
सब कुछ बिखेड गया
मेरी बनी बनायीं दुनिया पल में बिखड़ गयी
अकेली थी अकेली जी रही थी
पर उस दिन अकेलापन खलने लगा था
तेरे याद में मेरा मन भी बहकने लगा था
पता नहीं क्यों एक खुसी से जागी थी मन में
फिर हैरान थी मैं क्योंकि उदासी थी मेरी नयन में
उस दिन पहली बार मिली थी तुमसे
और तुमने पहली बार में ही सबकुछ छीन लिया मेरा
और मैं फिर भी सिर्फ तेरा ही इंतजार कर रही थी
अकेली थी, अकेली ही चल रही थी

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

My Poems....

I think something
and I write that on the page
something meaningless
something emotionless
something expressionless
and I say that
it is my own written poem poem
but can anybody tell me
how can any bunch of words
a meaningless, emotionless word be poem
is it possible
I thing its impossible
but I always write something
and call them my poems
like I just wrote this...
my new poem.....

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